बुधवार, 13 अप्रैल 2016

साधना वन sadhana forest

  साधना वन 

साधना वन का स्थापना और उदेश्य :

औरोविले में साधना वन का शुरुआत 2003 से हुई ,जिसका विकाश कार्य जारी है। 
साधना वन के संस्थापकों (मुख्य रूप से योरित और अविराम रोजिन ) ने औरोविले के बहरी इलाकों में बर्बाद  और बंज़र पड़े लगभग ७० एकड़ भूमि को सदाबहार वन बनने का प्रयास किया जा रहा है। साधना वन को २०१० में  मानवीय WAF (water एंड food ) तीसरे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
             यह पुरस्कार पर्यावरण और मानवीय कार्य के लिए भारत और हैती में साधना वन के द्वारा किया जा रहा कार्य की एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।
साधना वन भारत में : साधना वन का मुख्य उदेश्य स्थनीय ग्रामीण गाँवो का समर्थन के लिए है। पानी के सदुपयोग  ,खाने वाले फल फूलों की खेती को बढ़ावा देती है।  जिससे ग्रामीण लोग शहर के पलायन से बचे।

साधना वन गूगल मैप से :


साधना वन ज्यादा-से-ज्यादा प्राकृतिक संपदाओं का उपयोग करती है जिसमें की प्राकृतिक संपदाओं को बिना किसी प्रकार के नुसकान पहुचाये। खासकर ऊर्जा के मामले में सौर ऊर्जा का प्रयोग करने की सोच भी निराली है।

साधना वन घूमने का अपना ही मज़ा है , अगर आप कभी कोई जंगल घूमने नहीं गए हैं तो साधना वन जा सकते है।  जहाँ आप जंगल में घूमने का लुफ्त उठा सकते है। वहां वालंटियर्स के द्वारा घूमने हुए आये व्यक्ति के लिए रहने का प्रबंध किया जा सकता है। हां , ध्यान रखने बात ये है की आप ध्रूमपान नहीं करते हों। अगर आप ध्रूमपान करते हैं तो यहां आप ठहरना मुशकिल हो सकती है। 
और अगर आप साधना वन के बारे में जानना-समझना चाहते हैं तो आप वहां ठहर सकते है , इसके लिए आपको वहां काम-से-काम २ सप्ताह ठहरना पर सकता है। 
ज्यादा जानकारी के लिए विजिट करे 



पांडिचेरी बस स्टैंड से साधना वन गूगल मैप मार्ग 




कुछ चित्र  

 
 

       

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

मैथिली भाषा

मैथिली भाषा

मैथिली भाषा इतिहास
                                             मैथिली का प्रथम प्रमाण रामायण में मिलता है। यह त्रेता युग में मिथिलानरेश राजा जनक की राज्यभाषा थी। इस प्रकार यह इतिहास की प्राचीनतम भाषा मानी जाती है। प्राचीन मैथिली के विकास का शुरूआती दौर प्राकृत और अपभ्रंश के विकास से जोड़ा जाता है। लगभग ७०० इस्वी के आसपास इसमें रचनाएं की जाने लगी। विद्यापति मैथिली के आदिकवि तथा सर्वाधिक ज्ञाता कवि हैं। विद्यापति ने मैथिली के अतिरिक्त संस्कृत तथा अवहट्ट में भी रचनाएं लिखीं। ये वह दो प्रमुख भाषाएं हैं जहाँ से मैथिली का विकास हुआ। भारत की लगभग 5.6 प्रतिशत आबादी लगभग 7-8 करोड़ लोग मैथिली को मातृ-भाषा के रुप में प्रयोग करते हैं और इसके प्रयोगकर्ता भारत और नेपाल के विभिन्न हिस्सों सहित विश्व के कई देशों में फैले हैं।

 मैथिली भाषा विकाश के सतत प्रयास                         
                                              मैथिली विश्व की सर्वाधिक समृद्ध, शालीन और मिठास पूर्ण भाषाओं में से एक मानी जाती है। मैथिली भारत में एक राजभाषा के रूप में सम्मानित है। मैथिली की अपनी लिपि है जो एक समृद्ध भाषा की प्रथम पहचान है।नेपाल हो या भारत कही भी सरकार के द्वारा मैथिली भाषा के विकास हेतु कोई कदम नहीं उठाया गया है। अब जा कर गैर सरकारी संस्था और मीडिया द्वारा मैथिली के विकास का थोड़ा प्रयास हो रहा है। अभी १५/२० रेडियो स्टेशन ऐसे है जिसमें मैथिली भाषा में कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है। समाचार हो या नाटक कला और अन्तरवार्ता भी मैथिली हो रहा है। किसी किसी रेडिओ में तो ५०% से अधिक कार्यक्रम मैथिली में हो रहा है। ये पिछले २/३ वर्षो से विकास हो रहा है ये सिलसिला जारी है। टीवी में भी अब मैथिली में खबर दिखाती है। नेपाल में कुछ चैनल है जैसे नेपाल 1, सागरमाथा चैनल, तराई टीवी और मकालू टीवी है।

लिपि 

     पहले इसे मिथिलाक्षर तथा कैथी लिपि में लिखा जाता था जो बांग्ला और असमिया लिपियों से मिलती थी पर कालान्तर में देवनागरी का प्रयोग होने लगा। मिथिलाक्षर को तिरहुता या वैदेही लिपी के नाम से भी जाना जाता है। यह असमिया, बाङ्गला व उड़िया लिपियों की जननी है। उड़िया लिपी बाद में द्रविड़ भाषाओं के सम्पर्क के कारण परिवर्तित हुई।
मैथिली भाषा इंटरनेट पर
                                       वैसे तो मैथिली  इंटरनेट पर वर्षों पहले अपनी उपस्तिथि दर्ज की है लेकिन हाल ही में मोज़िला फाउंडेशन ने इंटरनेट पर मैथिली भाषा को प्रोत्साहन देने की घोषणा की है। ये प्रोत्साहन लोकलाइजेशन सपोर्ट के साथ दिया जाएगा |लोकलाइजेशन सपोर्ट में आप किसी दूसरी भाषा के वेबसाइट को आप मैथिली भाषा में पढ़ सकते हैं |
ये घोषणा चेन्नई में आयोजित हुए तीसरे फ्यूल जिल्ट कांफ्रेंस में कहा गया है |इस कार्यक्रम के प्रायोजक थे रेड-हैट, मोज़िला और सी -डैक | 
मैथिली में समाचार
                   इस समय मैथिली में समाचार इसमाद और मैथिली जिंदाबाद जैसे साइट द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है  

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

अंगिका भाषा( Angika )

अंगिका भाषा

अंगिका भाषा का इतिहास

          अंगिका अंग देश की भाषा छिय । अंगिका के बारे में बात करने से पहले अंग प्रदेश की बात करते हैं। अंग का पहला जिक्र गांधारी, मगध और मुजवत के साथ अथर्व वेद में आता है। गरुड़ पुराण, विष्णु धर्मोत्तर और मार्कंडेय पुराण प्राचीन जनपद को नौ भागों में बांटते हैं...इसमें पूर्व दक्षिण भाग के अंतर्गत अंग, कलिंग, वांग, पुंडर, विदर्भ और विन्ध्य वासी आते हैं।
                                बुद्ध ग्रन्थ जैसे अंगुत्तर निकाय में अंग १६ महाजनपद में एक था। अंग से जुड़ी हुयी सबसे प्रसिद्धि कहानी महाभारत काल की है। पांडव और कौरव जब द्रोणाचार्य के आश्रम से अपनी शिक्षा पूर्ण करने लौटते हैं तो अर्जुन के धनुर्विद्या कौशल का प्रदर्शन देखने के लिए प्रजा आती है...यहाँ वे अर्जुन का प्रदर्शन देख कर दंग रह जाते हैं. पर तभी भीड़ में से एक युवा निकलता है और अर्जुन के दिखाए सारे करतब ख़ुद दिखाता है और अर्जुन से प्रतियोगिता करना चाहता है. द्रोणाचार्य ये देख चुके थे कि वह युवक बहुत प्रतिभाशाली है और अर्जुन को निश्चय ही हरा देगा...इसलिए वह उससे उसका कुल एवं गोत्र पूछते हैं यह कहते हुए कि राजपुत्र किसी से भी नहीं लड़ते...

                                दुर्योधन ये देख कर अपनी जगह से उठता है और उसी वक्त कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करता है...यह कहते हुए कि अब तो प्रतियोगिता हो सकती है। द्रोणाचार्य तब भी उसके कुल के कारण उसे एक राजपुत्र का प्रतियोगी नहीं बनने देते हैं. कर्ण को सूतपुत्र कहा जाता है जबकि वास्तव में वह कुंती का पुत्र होता है जिसका कुंती ने परित्याग कर दिया था क्योंकि वह उस समय पैदा हुआ था जब कुंती कुंवारी थी. यहाँ से दुर्योधन और कर्ण की मैत्री शुरू होती है जिसे कर्ण अपनी मृत्यु तक निभाता है...क्योंकि दुर्योधन ने उसका उस वक्त साथ दिया था जब सारे लोग उसपर ऊँगली उठा रहे थे.
                              महाभारत और मसत्य पुराण में लिखा है की अंग प्रदेश का नाम उसके राजकुमार (कर्ण नहीं) के कारण पड़ा...जिसके पिता दानवों के सेनापति थे। प्राचीन काल में अंग प्रदेश की राजधानी चंपा थी...भागलपुर के पास दो गाँव चम्पापुर और चम्पानगर आज उस चंपा की जगह हैं। रामायण और महाभारत काल में अंग देश की राजधानी भागदत्त पुरम का जिक्र आता है...यही वर्तमान भागलपुर है। अंग प्रदेश वर्तमान बिहार झारखण्ड और बंगाल के लगभग ५८,००० किमी स्क्वायर एरिया के अंतर्गत आता है। 
                                                                                 तो ये हुयी अंग प्रदेश की बात...यहाँ की भाषा को अंगिका कहते हैं। अंगिका भाषी भारत में लगभग ७ लाख लोग हैं. इस भाषा का नाम भागलपुरी इसकी स्थानीय राजधानी के कारण पड़ा इसके अलावा अंगिका को अंगी, अंगीकार, चिक्का चिकि और अपभ्रन्षा भी बोलते हैं. अंगिका की उपभाषाएं देशी, दखनाहा, मुंगेरिया, देवघरिया, गिध्होरिया, धरमपुरिया हैं. अक्सर भाषा का नामकरण उसके बोले जाने के स्थान से होता है।  प्राचीन समय में अंगिका भाषा की अपनी एक स्वतंत्र लिपि अंग थी। 

अंगिका भाषा क्षेत्र

                                  अंगिका मुख्य रूप से प्राचीन अंग यानि भारत के उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण बिहार, झारखंड, बंगाल, आसाम, उङीसा और नेपाल के तराई के इलाक़ों मे बोली जानेवाली भाषा है। यह मैथिली की एक बोली के तौर पर जानी जाती है। इसका यह प्राचीन भाषा कम्बोडिया, वियतनाम, मलेशिया आदि देशों में भी प्राचीन समय से बोली जाती रही है। अंगिका भाषा आर्य-भाषा परिवार का सदस्य है और भाषाई तौर पर बांग्ला, असमिया, उड़िया और नेपाली, ख्मेर भाषा से इसका काफी निकट का संबंध है। प्राचीन अंगिका के विकास के शुरूआती दौर को प्राकृत और अपभ्रंश के विकास से जोड़ा जाता है। लगभग 1.5 से 2 करोड़ लोग अंगिका कोमातृ-भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं और इसके प्रयोगकर्ता भारत के विभिन्न हिस्सों सहित विश्व के कई देशों मे फैले हैं। भारत की अंगिका को साहित्यिक भाषा का दर्जा हासिल है। अंगिका साहित्य का अपना समृद्ध इतिहास रहा है और आठवीं शताब्दी के कवि सरह या सरहपा को अंगिका साहित्य में सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है। सरहपा को हिन्दी एवं अंगिका का आदि कवि माना जाता है।

अंगिका भाषा का ई-करण

                                अंगिका में लिखित एवं अलिखित दोनों ही तरह के साहित्य प्रचुर मात्र में उपलब्ध है। 
आज जब लग रहा है की कई भाषा ई-दुनिया के कारण अपनी दम  तोड़ रही है ,तो अंगिका इससे परे अपनी 
मौजूदगी इंटरनेट पर दर्ज करवा ली है।  इसका श्रेय कुंदन अमिताभ को जाता है , जिन्होंने सन २००३ ई में 
अंगिका.कॉम  वेब पोर्टल की शुरुआत की। 
                                 साथ ही कुंदन अमिताभ के सहयोग से विश्व के अव्वल दर्जे का सर्च इंजन 
गूगल.कॉम अंगिका भाषा में २००४ से उपलब्ध है। 
                                 ई-दुनिया में एक दशक से ज्यादा दिन होने के बाद भी अंगिका भाषा का ज्यादा ई-करण नहीं होने का कारण अंगिका भाषा जानने वाले तकनीशियन का कमी या अंगिका भाषा जानने वाले ई-विशेषज्ञ में अपने मातृभाषा के प्रति समर्पण का कमी। 
                              
                                   उपरोक्त दी गई  जानकारी किसी ब्लॉग या साइट से ली गई है। 

मंगलवार, 29 मार्च 2016

पत्रकारिता विकल्पीय प्रश्न-उत्तर


                         पत्रकारिता विकल्पीय प्रश्न-उत्तर 

1.भारत में पत्रकारिता की शुरुआत कब हुई ?
    a ) 1789   b ) 1779   c)  1781   d)  1780 
उत्तर-
2. भारत में परकरिता के जनक माने जाते हैं-
  a) दयानन्द सरस्वती   b) जेम्स अगस्टस हिक्की  c)  दादा भाई नरोजी   d) वारेन हेस्टिंग्स 
उत्तर-
3. भारत कि प्रथम समाचार-पत्र कौन थी ?
  a) बंगाल हिक्की गज़ट   b) हिंदुस्तान   c.) टाइम्स ऑफ़ इंडिया  d)  दी राइजिंग सन 
उत्तर-
4. प्रथम हिंदी समाचार-पत्र कब प्रकाशित हुई -
 a) 1822    b) 1826   c) 1829   d) 1844 
उत्तर-30 मई 1826 
5. भारत में सर्वप्रथम रेडियो की शुरुआत कब हुई ?
 a) 1881   b )   1905   c) 1921   d) 1936 
उत्तर-
6. भारत में टेलीविज़न की शुरुआत कब और कहाँ से हुई ?
a)  1959 (दिल्ली )    b)  1956 (ओड़िशा )  c) 1961(पटना)   d)1965 (चेन्नई) 
उत्तर-
7.सी पत्रकारिता जिसमें फ़ैशनअमीरों की पार्टियों ,महफ़िलों और जानेमाने लोगों के निजी जीवन  के बारे में बताया जाता है।
a ) पीत पत्रिकारिता   b.) खोजी पत्रकारिता  c ) पेज थ्री पत्रिकारिता d) सनसनी खोज पत्रिकारिता 
उत्तर-
8. हिंदी में सर्वप्रथम नेट परकरिता कौन है ?
a ) वेब दुनिया   b) प्रभा साक्षी  c) तहलका डॉट कॉम  d ) सिफी 
उत्तर-
9. समाचार में महत्वपूर्ण तथ्यों को सबसे ऊपर रखना कौन सा सिंद्धांत है?
a ) बुलेट सिंद्धांत   b ) उल्टा पिरामिड सिद्धांत  c) सीधा पिरामिड  d ) अवलोकन सिंद्धांत 
उत्तर-
10 पत्रकारिता दिवस कब मनाया जाता है ?
a) 21 जून   b ) 31 मई   c) 31 जून    d ) 21 मई 
उत्तर-

मंगलवार, 1 मार्च 2016



प्रश्न. पारंपरिक पत्रकारिता और वेब पत्रकारिता के बीच में अंतर स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर:-

सामानत: पारम्परिक पत्रकारिता उसे कहते हैं जो कई संदियों के स्वरुप को वर्त्तमान स्तिथि में बनाये रखता है। वर्त्तमान में पारम्परिक पत्रकारिता का स्त्रोत प्रिंटिंग प्रेस है , जो कागज में छापती है।

भारत में प्रिंटिंग समाचार पत्र का नीव 1780 में एक अँगरेज़ व्यक्ति जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने रखी , जिन्होंने अंग्रेज़ो के दुवारा किये जा रहे गलत कामों को लोगो को बताने के लिए प्रिंटिंग समाचार पत्र की स्थापना की। यह समाचार पत्र बंगाल हिक्की गज़ट के नाम से जाना गया। इस तरह जेम्स ऑगस्टस हिक्की भारतीय पत्रकारिता के जनक बन गए।

1990 के दशक के पहले भारत में पारम्परिक पत्रकारिता को चुनौती देने वाला कोई नहीं था , यहाँ तक की डिजिटल मीडिया भी इसे चुनौती देने में असमर्थ थी। लेकिन 1990 आते-आते परम्परिक पत्रकारिता को चुनौती देने के लिए वेब-पत्रकारिता आ धमकी , उस समय कोई सोचा भी नहीं होगा की वेब पत्रकारिता इस तरह आगे बढ़ेगी की प्रिंटिंग प्रेस ही नहीं ,डिजिटल मीडिया को भी कही पीछे छोड़ देगी।

2000 ई. आते-आते वेब-पत्रकारिता ने बता दिया की आने वाला समय वेब-पत्रकारिता का है। और वेब-पत्रकारिता जो 90 के दसक में ही नई मीडिया के नाम से जाना गया , आज लगभग 25 साल बाद भी नई मीडिया के नाम से ही जान जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण इसकी असीमित दायरा है।

दरअसल वेब-पत्रकारिता इंटरनेट पर उपलब्ध करायी गई समाचार है। जो पारम्परिक पत्रकारिता की तरह समाचार तो उपलब्ध कराती है , परन्तु यह पारम्परिक पत्रकरिता के उलट लोगो के ऑनलाइन समाचर उपलब्ध कराती है।

इसकी दायरा इतनी व्यापक है कि ये डिजिटल मीडिया को भी अपने में समेट लेती है। इसके साथ ही यह बड़ी ही सुगमता से विशव के किसी भी कोने से सुगमता से देखा जा सकता है। जिसके लिए एक इंटरनेट एक्सेस डिवाइस रहना चाहिए। इतना ही नहीं यह किसी भी पुराने समाचार को कभी भी एक्सेस करने का जरिया है। साथ ही यहाँ समाचार हर नया उपलब्ध कराया जा सकता है।

वही पारम्परिक पत्रकारित में हमें किसी भी जानकारी के लिए कम-से-कम सुबह का इंतज़ार करना पड़ता है , यह सुगमता से हर जगह उपलब्ध नहीं है। किसी पुराने समाचार को ढूढ़ने में खासे मुशकील का सामना करना पड़ता है।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

प्रश्न - समाचार पत्रों के लिए आवश्यक तत्व क्या है ?

उत्तर -
             समाचार के लिए आवश्यक तत्व जानने से पहले हम ये बता दे कि समाचार क्या है ,वैसे तो समाचार को प्रभाषित करना आसान नहीं है। फिर भी हम कह सकते हैं की समाचार हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसके बिना हम एक सही समाज की कल्पना नहीं कर सकते हैं। अतः समाचार हमारे समाज ,राज्य ,देश और विदेश के सार्थक घटना का  त्वरित उल्लेख हो सकता है।
               उपरोक्त बातो को पूरा करने के लिए आवश्यक तत्व निम्न है :-
1. स्पष्टता :-
                  किसी भी समाचार पत्र को अपने लेखन में छोटे -छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए और लेखन शुध्द एवं स्पष्ट हो।  जिससे पाठकों  का रूचि  बना रहे।

2. नूतनता:-
                कोई भी समाचार तभी पाठक  को अपनी ओर खिंच सकती है , जब वो सदैव ताजा घटनाओ का वर्णन हो।

3. उदेद्श्य :-
                  किसी भी समाचार  पत्रिका का मुख्य उदेश्य होनी चाहिए की वो सदैव किसी घटना को पाठक के समक्ष सत्यता के साथ प्रस्तुत करे , जिससे समाचार एजेंसी पाठक का भरोषा जीत सके या पाठक पत्रिका में अपनी भरोषा बनाये रखे। लेखन में हमेशा अपनी सोच से बचना चाहिए एवं निष्पक्षता निभाना चाहिए।

4. समानता:-
                 कोई भी समाचार अगर ऐसी घटना से सम्बंधित हो जो दो पक्ष के बारे में हो तो वहां लेखन में किसी भी पक्ष में लिखने से बचना चाहिए।  ऐसी स्तिथि में जो सार्थक हो वही लिखना चाहिए। जिससे समाचार की सत्यता बानी रहे।

5. समीपता:-
                 पाया गया है कि पाठक ज्यादातर आस-पास के समाचारो में रूचि रखता है , अतः समाचार लेखन में आस -पास के समाचारों को तरहीज़ देना चाहिए।

6. मनोरंजन:-
                    आज के ज़माने में ये मनोरंजन किसी भी पत्रिका का महत्वपूर्ण अंग बन गया , अतः पाठक को बनाये रखने के लिए खेल,फिल्म  एवं अन्य मनोरंजन को अपने समाचार में जगह देनी चाहिए।

7. शिक्षा :-
              आज समाचार में इसका स्थान प्रमुख हो गया है क्योंकि युवा वर्ग को अपने ओर खिचे रहते हैं , अतः समय -समय पर होने वाले तकनिकी खोज को समाचार में प्रमुखता से स्थान देनी चाहिए

8. यथार्थ :-
           किसी भी समाचार में यथार्थता की बुनियादी जरूरत है। यदि आप यथार्थता को नजरअंदाज करेंगे तो आप पाठकों का विश्वास ग्रहण नहीं कर पाएंगे। इसलिए अपने लेख की जानकारियों तथा तथ्यों की बार-बार जांच करना आवश्यक है। नामों को, आंकड़ों तथा तथ्यों को शुद्धता के साथ लिखें। छोटी-छोटी गलतियों से बचे रहिए।